Tuesday, April 17, 2012

सुन्दर मुख है तो सुंदर वचन और सुंदर आदतों का होना भी आवश्यक है,

 सुन्दर मुख है तो सुंदर वचन और सुंदर आदतों का होना भी आवश्यक है,अन्यथा सोहनी सूरत किस काम की,एक खूबसूरत शहर सुंदर सा बंगला और उसमे कोई रहता न हो उल्लू बोलते हो तो उस बंगले की क्या शोभा हो सकती है,एक हरा भरा वृक्ष,उस पर फूल और फल न आते हों तो उस का क्या लाभ हो सकता है ???
 सुन्दर सोने की घडी हो और समय न बताती  हो तो उस घडी का क्या फायदा,खूबसूरत लेम्प हो और रौशनी न देता हो तो उस खूबसूरत लेम्प का क्या फायदा,किसी जंगल में कुआ हो और उसमे पानी न हो तो उस कुए का क्या फायदा,इसी प्रकार एक मनुष्य कितना भी शुन्दर हो कितने भी सुन्दर वस्त्र पहने हों,उसमे शिष्टता न हो और बह व्यवहारिक न हो,नर्म दिल न हो,तो ऐसे मनुष्य का जीव को क्या फायदा,,
  हमारे मुख से कोमल वचन निकले तो हमारा कुछ भी खर्च नहीं होता,न ही हमारे अन्दर कोई कमी आती है,कोमल  वचन बोलने का असर सबसे पहले अपने आप पर ही पड़ता है,फिर दूसरों पर,,मिठास पूर्ण वचनों की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती,
  जब हम खुश होकर किसी से मिलते हैं तो हम ख़ुशी के फूल बिखेरते हैं,जिसकी खुशबू से दूसरा भी सुगन्धित होता है,अगर हम ख़ुशी के साथ किसी से मिले,तो उसका अंश उसको भी मिलेगा,अगर हम कडुवे वचन बोलेंगे तो दुसरे को तो कष्ट होगा ही,एक नई मुसीबत को जन्म भी देंगे,इसलिए हमें कभी भी उग्रस्वभावी नहीं होना चाहिए,हमें अपने-आस पास के सगे साथियों से जिनसे हमारा रोज ही वास्ता पड़ता है ,उनके साथ सभ्य रहने की आवश्यकता है,
 खास समय पर सभ्य रहने को ही शिष्टता कहते है,हमेशा नरमी और सुशीलता का स्वभाव वना हुआ है तो वह मुर्दे के समान भी है,लेकिन नरमी और सुशीलता का स्वभाव परमार्थ में बहुत लाभ दायक है,सभ्य और प्रसन्न रहने बाले भाई बहिन असली मनुष्य भी कहलाने के अधिकारी भी हैं,
 इस जीवन में परमात्मा की प्राप्ति तो होती है पर सच्चे  और प्रसन्नचित मनुष्य नहीं मिलते, इन्सान तो कहीं-कहीं ही नज़र आते हैं:-कबीर जी ने कहा है ! कि शभी मनुष्य देखने में तो एक जैसे दिखाई देते हैं,पर मिलने पर और जानने पर अलग होते हैं,
 जैसे बगुला और हंस देखने में तो एक जैसे ही होते हैं,पर उनके कर्म अलग-अलग होते है, हंस तो मोती चुगते हैं,जबकि  बगुला मछली और कीड़े-मकोड़े हड़प करता  है,शारीरिक सुन्दरता तो मोर और गरुण में भी होती है,पर असल सुन्दरता तो हमारे अन्दर की है,जो बाहर की सुन्दरता से कही बिल्क्षण है,जो अन्दर से कुरूप है,बाहर से कितना भी सुन्दर हो,उसकी उस सुन्दरता का कोई मूल्य नहीं...इसलिए हमें अंदर से सुन्दर और सुशील होना चाहिए....

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