इस संसार के शभी प्राणी अपने-अपने काम का सुमिरन करते है,दुकानदार अपनी दुकान एवं अपने कारोवार का, किसान अपनी जमीन और खेतिवाडी का,नौकरी पेसा अपने-अपने काम काज का,माता अपने बच्चों का,मित्र-मित्र का शत्रु-शत्रु का सुमिरन करता है,यह तो नियम है,जिसका सुमिरन किया जाय उसका रूप सामने आ जाता है,वास्तव में हम जिसका सुमिरन करते हैं उसी का ध्यान भी रहता है,यह स्वभाविक साधन है इससे कोई अलग नहीं है,सुमिरन द्वारा दुनिया मनुष्य के मन,बुद्धि,रोम-रोम में समाई हुई है और मनुष्य दुनिया का रूप बना हुआ है,यह जीव के संसार में बारम्बार आने का ही कारण है, "जहाँ आसा वहां वासा" अगर मनुष्य संसार का सुमिरन छोड़कर परमात्मा का सुमिरन-ध्यान करे तो उसकी मुक्ति का उपाय सहज ही बन सकता है,इसलिए हमें आज से परमात्मा का सुमिरन शुरू कर देना चाहिए..

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