स्मरण क्या है,इसको समझने के लिए हमें इसके वास्तिविक अर्थ पर विचार करना चाहिए,इसके कई अर्थ हैं ,याद रखना ,रक्षा करना,मानसिक रूप से अपने परमात्मा की छवि को अपने ह्रदय में स्थापित कर ह्रदय में बसाये रखना,और अपने दिल में परमात्मा की याद बनाये रखना,,साँस-साँस में उसकी याद को न भूलना,उसको अपने जीवन का अंग बना लेना,उसी में जाग उठना,उसी में जीना,यही स्मरण है,
मुसलमान फकीर इसे 'जिक्र' कहते हैं, जिसका अर्थ है किसी को याद करना इसमें योग,यम,नियम,आसन,प्रणायाम ,धारणा,ध्यान और समाधि,के गुण स्वभाविक रूप से सरलता पूर्वक प्राप्त हो जाते हैं,
स्मरण या जप योग का अवश्यक अंग है,इसके बारे में गीता में आया है,"य़ज्ञानां जप यज्ञोस्मि" य़ज्ञों में "मैं जप यज्ञ हूँ,"अर्थात जप ही सबसे उत्तम यज्ञ है, 
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