लोग कहते है कि हम परमात्मा को मानते हैं ,परमात्मा की पूजा भी करते है और प्यार भी करते हैं,परमात्मा को मानना और पूजना माना जा सकता है,पर प्यार करना नहीं हो सकता,क्योकि सच्चा प्यार तो किसी जीव के साथ ही हो सकता है,अन्य किसी के साथ नहीं ,उदहारण के लिए एक मनुष्य अपनी पत्नी के साथ प्यार करता है,पर यदि उसकी मृत्यु हो जाय फिर उसको सूक्ष्म शरीर मिले,फिर पत्नी के सूक्ष्म शरीर को पति मिले तो पत्नी को भूत-भूत कह कर उसकी ओर ध्यान नहीं देता,इसका कारण स्पष्ट है कि अब बह उस तत्व की नहीं रही,अब स्त्री सूक्ष्म शरीर में है और बह मनुष्य स्थूल शरीर में,इसी प्रकार परमात्मा सूक्ष्म हैं,सर्वोपरी भी हैं तथा मनुष्य अभी तक स्थूल है,उसको किसी ऊँचे दर्जे के संत की आवश्यकता है जो उसे स्थूल शरीर से निकाल कर सूक्ष्म,बना कर सूक्ष्म परमात्मा के साथ मिला सके,तभी मनुष्य परमात्मा से प्रेम करने योग्य बन पता है,
कबीर जी ने कहा है:-
मन मेरा पंछी भया,उड़ कर चला आकाश,,
श्वर्गलोक खाली पड़ा,सब संतन के पास ,,
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