Tuesday, May 28, 2013

सांसारिक बन्धनों की डोर (Door of earthly bonds)

पूज्यनीय संत श्री मुखवाणी 
एक समय की बात है ऊंटों का काफिला कहीं जा रहा था, राह में रात हो गई,ऊंटों को जब बांधा गया तो एक रस्सी कम निकली. आशंका थी कि ऊंट को बांधा नहीं गया तो रात कहीं चला न जाये हर उपाय किये पर बात न बनी तब दूर सन्त  की  कुटिया दिखी,काफिले का मालिक सन्त के पास गया और समस्या बताई सन्त  ने कहा रस्सी तो मेरे पास भी नहीं है पर उपाय बताता हूँ जैसे सारे ऊटों को बांधा है, वैसे ही आखरी ऊंट को बांध दो बिना रस्सी के- काफिले के  मालिक ने वैसे ही किया, हाथ में रस्सी न थी पर गले में हाथ घुमा के गांठ बांध दी फिर खूंटे में रस्सी बांधने का नाटक किया. ऊंट बैठ गया-सुबह काफिले को रवाना होना था सारे ऊंट तेयार  हो गये पर एक ऊंट बैठा रहा  हर सम्भव  यत्न किए-काफिले का मालिक सन्त  के पास पहुंचा और समस्या बताई..सन्त  ने पूछा तुमने ऊंट को खोला..काफिले वाला बोला मैंने उसे बाँधा ही कहाँ है..सन्त  ने कहा रात जैसे बांधा था वैसे ही खोल दो,काफिले वाले ने ऊंट को खोलने का नाटक किया-ऊंट उठ के खड़ा हो

गया ।।।।।
"क्या हम ऐसी  ही किसी मोह की डोर से नहीं बंधे हैं"

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