हमारा यह शरीर ही उस परमात्मा का मंदिर है,जिसे हम बाहर के मंदिरों में ढूँढ़ते फिरते हैं,जब हम इसके द्वार अन्दर से बंद कर लेते हैं,और बाहर की चीजों से अपना मुख मोड़ लेते हैं और उस प्रभु परमात्मा के आगे नतमस्तक हो प्रार्थना करते है तो उन प्रीतम के दर्शन होने लगते हैं,उनके दर्शन तो हम बाहर की आँखों को बंद कर,हम अपनी अन्दर की आँख खोले तो हमारी अन्दर की ही आँख उनके दर्शन कर सकती है,
और अधिक गहरी प्रार्थना में पहुचने के लिए हमें अपने बाहर के संसार में फैली इन्द्रियों को बापस अपने अन्दर की ओर मोड़ना होगा या यूं कहिये की बाहर की इन्द्रियों के दरबाजे बंद करने जरूरी हैं,होठ बंद हों शारीर से भी हम बाहर हों (बेशुध होकर जिसमे शरीर का भी होश न रहे की हमारा शरीर भी है) और उनके चरणों में ही ध्यान रहे,ऐसी सच्ची अवस्था हो और सच्चे हार्दिक भाव हों,तब ही प्रभु अपनी बाहे आगे बढाएंगे,ऐसी पवित्रता और भावना सहित प्रभु की दिल में याद हो।
पर यह कार्य केवल व्यवहार के दिखावे की द्रष्टि से न हो सच्ची और हार्दिक भावना के साथ हो, गुरु साहब फिर कहते है की सच्चे आंतरिक भाव भरे विश्वाश के साथ प्रार्थना की जाय तो हमारी यह करुण पुकार प्रभु सुनते हैं तब ही उसकी असीम कृपा का प्रसाद हमें मिलता है।
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