Sunday, January 29, 2012

कर्म-फल

सत्संग मनुष्य की आत्मोन्नति के लिए एक प्रभावशाली  साधन है,यह शभी के लिए असर कारक है,चाहे मनुष्य का व्यवहार अच्छा हो या बुरा कैसा भी हो सत्संग से जीवन में फायदा ही मिलता है,सत्संग लेने से अपनी-अपनी योग्यता अनुसार उन्नति होती है,मनुष्य के जीवन में अपने-अपने पूर्व के कर्मो के अनुसार कुछ स्वतंत्रता जरूर प्राप्त है,जिससे हम लाभ उठा सकते हैं,हम सत्संग में रहकर उसमे व्याप्त परमात्मा के कुछ अंश पाकर कर्मों की जकड से मुक्त हो सकते हैं,कर्मो की श्रंखला का चक्र बड़ा प्रबल   है,मनुष्य की क्या हैसियत कई अवतार तक सब इसके घेरे में रहे हैं,
भगवान श्री रामचंदर जी ने सुग्रीव के भाई बाली को पेड़ कि आड़ लेकर तीर मारा था,बाली ने कहा मैंने आपका कुछ बिगाड़ा नहीं था,
  जब श्रीक्रष्ण जी का अवतार हुआ और उनका अंत समय आया,वे जंगल में बाये घुटने पर दया पैर रखकर लेटे हुए थे और उनके पैर का पदम चमक रहा था,जरा नामक भील ने उसे हिरन की आँख समझकर तीर मारा जिससे श्रीक्रष्ण जी ने अपने प्राण त्याग दिए,
  सुग्रीव वानर के भाई बाली का अवतार जरा नामक भील हुआ था,भगवान श्री रामचंदर जी,जिनोहने पेड़ कि ओट लेकर बाली के बाण मारा था,ने श्रीक्रष्ण जी का अवतार धारण किया था,
  कर्म गति बड़ी बलवान है उसके फलस्वरूप भगवान को भी भील के बाण से प्राण त्यागने पड़े,कर्म-फल नियम के आगे,किसी की नहीं चली यह तो भोगना ही पड़ता है,जिसके आगे सभी जीव बेबस है |

No comments:

Post a Comment