Monday, November 18, 2024

श्री कृष्ण ने समस्त ब्रह्मांड अपने मुंह में क्यों दिखाया

 

ऐसा कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने अपनी मां यशोदा को अपने मुंह में पूरा ब्रह्मांड दिखाया था

श्री कृष्ण को ब्रह्मांड का पिता कहा जाता है और वही हमारे निर्माता हैं. इसीलिए उन्होंने यह दिखाने के लिए कि पूरा ब्रह्मांड उनका ही हिस्सा है, यशोदा मईया को अपने मुंह में ब्रह्मांड के दर्शन करा दिए,

कहा जाता है कि एक दिन यशोदा अपने बेटे कान्हा को नदी किनारे ले गई थीं और वहां कान्हा मिट्टी खाने लगे. धरती माँ प्रकट होकर उन्हें प्रणाम करती हैं. यशोदा ने कान्हा को मुंह खोलने के लिए कहा और जैसे ही कान्हा मुंह खोलते हैं, यशोदा को कान्हा के मुंह में ब्रह्मांड दिखाई देता है. यशोदा इस दृश्य से स्तब्ध रह गईं. एक कहानी के अनुसार मानव शरीर ब्रह्मांड के तत्वों से बना है और ब्रह्मांड का हर तत्व हमारे शरीर में मौजूद होता है, इसीलिए श्री कृष्ण जी ने मां यशोदा को अपने मुख में ब्रह्मांड के दर्शन करा दिए 

Saturday, January 25, 2020

त़प एवं साधना का सम्बन्ध


           त़प एवं साधना का सम्बन्ध मन से होता है,जब हमारे मन में तीव्र जिज्ञासा उठती है तभी साधना साधी जा सकती है,तभी तपस्या भी प्रारम्भ होती है हमारा शरीर तो इन सबका माध्यम मात्र है,शरीर इस पावन कार्य में बाधा बने इसलिए हमें शरीर को स्वस्थ बनाये रखना चाहिए क्यु  की हमारे मन का कहना मानना हमारे इस शरीर का धर्म है,जहाँ तक साधना की बात है उसकी सारी शर्ते एवं विचार मन की गहराइयों में होने चाहिए,अगर हम मन में संसार की लालसाओं को लेकर तपस्या -साधना करना चाहेंगे तो तपस्या -साधना सम्भव नहीं है,,,
         यह लाइने उन सभी भाई बहिनों के लिए हैं जिनके अन्दर साधना के संस्कार है,जो सच्चे मन से साधना के पथ पर चलने के लिए आतुर हैं,और जिनके अन्दर साधना के प्रति लगन एवं निष्ठा गहरी है,
साधना-तपस्या तो एक अविरल धारा है जो हमेशा बहती रहती है,जो जिज्ञासुओं को अपनी ओर आकर्षित करती रहती है,जो इसमें जितना डूबता है उतना ही मगन होता जाता है,अगर हमें इस रह पर चलना है तो प्रचंड वेग से उफनती नदी के बीचों-बीच मजधार में हमें अपने जीवन रुपी किश्ती को झोकना ही पड़ेगा   तपस्या करनी है तो भीषण झंझावातो में निर्भीक होकर हमें इस रह पर चलना ही पड़ेगा ,मन में संसार की  सुखद लालसा एवं लुभावने आकर्षण ओर मनोरम कामनायों को लेकर  हम इस पथ पर नहीं चल सकते,क्युकी संसार के आकर्षण ओर साधना का घालमेल नहीं हो सकता जिसे संसार प्रिय है,उसे यही रहना चाहिए,इसी संसार में ,इसे पाने का प्रयत्न करता रहे,परन्तु संसार को बनाये रखकर अध्यात्म की डगर पर चलने वाले भाई बहनों के हाथो सिर्फ हताशा ही हाथ लगेगी,इससे ओर अधिक नहीं,इसीलिए हम ही लोग अध्यात्म-तपस्या के बारे में बेतुकी बाते करते नज़र आते हैं क्युकी संसार का आकर्षण हम से छूटता नहीं है फिर हम इस रास्ते पर बड़े ही क्यों थे ,अगर हमने अपने कदम इस रास्ते पर बड़ा लिए है तो अविश्वाश कैसा चयन करना भी तो हमारे हाथ में है, हम स्वतंत्र हैं चुनाव करने के लिए,पहले हम अपने आप को समझे,अपने अन्दर झांकें,हमारे अन्दर तो असीम कृपा है परमेस्वर की,कोई बाध्य नहीं कर सकता हमें लेकिन बात तो बने,इस पथ पर चलने की बात बनती ही नहीं इसीलिए हमारे अन्दर  भ्रम बना हुवा है,और भ्रमित मन कहीं नहीं ठहरता,और हमें साधना के लिए अयोग्य  बना देता है,आईये आज ही बड़े इस पथ पर अपने जीवन को स्वर्ग की और ले चले...  

Saturday, May 20, 2017

हमारे जीवन में भी कुछ क्षण

जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी। वो एकांत जगह की तलाश में घुम रही थी, कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये।
वहां पहुँचते ही उसे प्रसव पीडा शुरू हो गयी।उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी।उसने दाये देखा, तो एक शिकारी तीर का निशाना, उस की तरफ साध रहा था। घबराकर वह दाहिने मुडी, तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था। सामने सूखी घास आग पकड चुकी थी और पीछे मुडी, तो नदी में जल बहुत था।मादा हिरनी क्या करती ? वह प्रसव पीडा से व्याकुल थी। अब क्या होगा ? क्या हिरनी जीवित बचेगी ? क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी ? क्या शावक जीवित रहेगा ? क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी ? क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी ?क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी ? वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है। क्या करेगी वो ?
हिरनी ने अपने आप को शून्य में छोड, अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी। कुदरत का कारिष्मा देखिये -- बिजली चमकी और तीर छोडते हुए, शिकारी की आँखे चौंधिया गयी। उसका तीर हिरनी के पास से गुजरते, शेर को जा लगा। शेर मर गया और शिकारी, शेर को घायल ज़ानकर भाग गया। घनघोर बारिश शुरू हो गयी और जंगल की आग बुझ गयी। हिरनी ने शावक को जन्म दिया,,,हमारे जीवन में भी कुछ क्षण ऐसे आते है, जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं और कोई निर्णय नहीं ले पाते। तब कुछ पल ऐसे आते है, जब हम शुन्य हो कर, सब कुछ नियती के हाथो में छोड देते हैं, जैसे उस हिरनी ने किया,,जो पहली प्राथमिकता वो करो। जैसे हिरनी ने शावक को जन्म दिया। अपने आप से पूछें ? आप कहां केन्द्रित हैं ? आप का विश्वास और उम्मीद किस से है ? ईश्वर आप के साथ हैं और आपको निराश नहीं करेंगे,

Tuesday, August 25, 2015

पथरी (stone)

मित्रो, जिसको भी शरीर मे पथरी है वो चुना कभी ना खाएं ! (काफी लोग पान मे डाल कर खा जाते हैं )

क्योंकि पथरी होने का मुख्य कारण आपके शरीर मे अधिक मात्रा मे कैलशियम का होना है | मतलब जिनके शरीर मे पथरी हुई है उनके शरीर मे जरुरत से अधिक मात्रा मे कैलशियम है लेकिन वो शरीर मे पच नहीं रहा है वो अलग बात हे| इसलिए आप चुना खाना बंद कर दीजिए...
आयुर्वेदिक इलाज !
पखानबेद नाम का एक पौधा होता है ! उसे पथरचट भी कुछ लोग बोलते है ! उसके पत्तों को पानी मे उबाल कर काढ़ा बना ले ! मात्र 7 से 15 दिन मे पूरी पथरी खत्म !! और कई बार तो इससे भी जल्दी खत्म हो जाती !!!
होमियोपेथी इलाज !
अब होमियोपेथी मे एक दवा है ! वो आपको किसी भी होमियोपेथी के दुकान पर मिलेगी उसका नाम हे BERBERIS VULGARIS ये दवा के आगे लिखना है MOTHER TINCHER ! ये उसकी पोटेंसी हे|
वो दुकान वाला समझ जायेगा| यह दवा होमियोपेथी की दुकान से ले आइये।
(ये BERBERIS VULGARIS दवा भी पथरचट नाम के पोधे से बनी है बस फर्क इतना है ये dilutions form मे हैं पथरचट पोधे का botanical name BERBERIS VULGARIS ही है )
अब इस दवा की 10-15 बूंदों को एक चौथाई (1/ 4) कप गुण गुने पानी मे मिलाकर दिन मे चार बार (सुबह,दोपहर,शाम और रात) लेना है | चार बार अधिक से अधिक और कमसे कम तीन बार|इसको लगातार एक से डेढ़ महीने तक लेना है कभी कभी दो महीने भी लग जाते है। 
इससे जीतने भी stone है ,कही भी हो गोलब्लेडर gall bladder )मे हो या फिर किडनी मे हो,या युनिद्रा के आसपास हो,या फिर मुत्रपिंड मे हो| वो सभी स्टोन को पिगलाकर ये निकाल देता हे|
99% केस मे डेढ़ से दो महीने मे ही सब टूट कर निकाल देता हे कभी कभी हो सकता हे तीन महीने भी हो सकता हे लेना पड़े|तो आप दो महिने बाद सोनोग्राफी करवा लीजिए आपको पता चल जायेगा कितना टूट गया है कितना रह गया है | अगर रह गया हहै तो थोड़े दिन और ले लीजिए।
यह दवा का साइड इफेक्ट नहीं है। 
ये तो हुआ जब stone टूट के निकल गया अब दोबारा भविष्य मे यह ना बने उसके लिए क्या??? क्योंकि कई लोगो को बार बार पथरी होती है |एक बार stone टूट के निकल गया अब कभी दोबारा नहीं आना चाहिए इसके लिए क्या ???
इसके लिए एक और होमियोपेथी मे दवा है CHINA 1000|
प्रवाही स्वरुप की इस दवा के एक ही दिन सुबह-दोपहर-शाम मे दो-दो बूंद सीधे जीभ पर डाल दीजिए|सिर्फ एक ही दिन मे तीन बार ले लीजिए फिर भविष्य मे कभी भी स्टोन नहीं बनेगा।

Monday, February 2, 2015

आध्यात्मिक मंत्र तंत्र विद्या :--एक टेक्नोलॉजी कितनी बुरी कितनी भली

       तंत्र विद्या योग का सबसे निम्न रूप है, लेकिन लोग सबसे पहले यही करना चाहते हैं। वे कुछ ऐसा देखना या करना चाहते हैं, जो दूसरे नहीं कर सकते। योग के शब्दों में इसका मतलब है कि उन्होंने खुद को मूलाधार से व्यक्त किया है। इस विद्या को इतना बुरा माना जाता है कि इसके पास फटकने से भी मना किया जाता है। बदकिस्मती से इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर इसी तरह से किया गया है। लेकिन कोई भी विज्ञान या टेक्नोलॉजी बुरी नहीं होती। अगर हम टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल लोगों की जान लेने और उनको तकलीफ देने के लिए करते हैं, तो कुछ समय बाद लगेगा कि टेक्नोलॉजी बुरी चीज है। तंत्र-विद्या के साथ यही हुआ है। बहुत ज्यादा लोगों ने अपने निजी फायदे के लिए इसका गलत इस्तेमाल किया। इसलिए आम तौर पर इसको आध्यात्मिक मार्ग से दूर ही रखा जाता है। 
          भौतिक का अनेक प्रकार से उपयोग किया जा सकता है। मिसाल के तौर पर अगर आप इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी को देखें, तो जो चीज चट्टान जितने बड़े आकार से शुरू हुई थी, वह अब एक बहुत ही छोटे-से चिप तक पहुंच चुकी है। जितनी बातों को लिखने के लिए पूरा पहाड़ भी छोटा पड़ जाए, आज उतनी बात एक बहुत ही छोटे-से चिप में समा जाती है। भौतिक वस्तु अब सूक्ष्म होती जा रही है। जब हम भौतिकता के सबसे सूक्ष्म आयाम का उपयोग करते हैं, तो उसी को तन्त्र-विद्या कहते हैं।
दुनिया के कई हिस्सों में तंत्र-विद्या को आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है, जो कि ठीक नहीं है। जब हम आध्यात्मिकता की बात करते हैं, तो हमारा मतलब भौतिकता से परे जाने का होता है। आध्यात्मिकता तो आपके भीतर एक ऐसी अनुभूति लाने के लिए है जो भौतिक नहीं है। पर तंत्र-विद्या है तो भौतिक ही, चाहे हम भौतिकता के सूक्ष्मतम आयामों का ही उपयोग क्यों न करें।
          जैसे-जैसे आधुनिक टेक्नोलॉजी सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जाएगी, तंत्र-विद्या की जरूरत कम होती जाएगी। मान लीजिए हजार साल पहले मैं कोयंबटूर में होता और आप दिल्ली में, और मैं आपको एक संदेश देना चाहता तो या तो आपको इतनी दूर से यात्रा करके, चलते हुए मेरे पास कोयंबटूर आना पड़ता या मुझे चलते हुए आपके पास दिल्ली जाना पड़ता। दोनों ही बातें अव्यावहारिक होतीं, इसलिए मैं थोड़ा समय खर्च कर के तंत्र-विद्या में महारत हासिल कर लेता, ताकि मैं अपना संदेश आप तक आसानी से पहुंचा सकूं। लेकिन अब मुझे ऐसा करने की जरूरत नहीं, क्योंकि मेरे पास एक सेलफोन है। मैं अभी भी इस विद्या का इस्तेमाल कर सकता हूं, लेकिन आपको इसे ग्रहण करने लायक बनाने में, ताकि आप यह संदेश बिलकुल साफ -साफ ग्रहण कर सकें और उस पर संदेह न करें, बेकार में बहुत सारा वक्त लग जाएगा। यह सब करने के बजाय मैं आपको सीधे फोन कर सकता हूं। तो यह विद्या दिन-ब-दिन बेतुकी होती जा रही है, क्योंकि आधुनिक टेक्नोलॉजी बड़ी तेजी से आगे बढ़ रही है।
चूंकि लोगों ने ऐसे बुरे तांत्रिकों के बारे में सुन रखा है, जिन्होंने लोगों की जिंदगी बरबाद करने की कोशिश की या जिन्होंने लोगों को बीमार बनाया और मार डाला, इसलिए जब आप तंत्र-विद्या या जादू-टोने का नाम लेते हैं, तो वे समझते हैं कि यह हमेशा बुरा होता है। सामाजिक दृष्टि से संभव है आपने ऐसे ही लोगों को देखा हो। मगर तंत्र-विद्या बहुत ऊंची श्रेणी की भी होती है। शिव एक तांत्रिक हैं। जादू-टोना एक अच्छी और लाभकारी शक्ति हो सकता है। यह अच्छा है या बुरा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसका उपयोग कौन और किस मकसद से कर रहा है।
        तंत्र-विद्या जिसे अंग्रेजी में ऑकल्ट कहते हैं, को लेकर कई तरह के विचार लोगों के मन में आते हैं। कुछ तो इसे सीखने के लिए व्यग्र रहते हैं तो कुछ लोग इसे बहुत बुरा समझते हैं। तो आखिर माजरा क्या है ? क्या यह बुरा है या फिर फायदेमंद ? आइए जानते हैं सद्‌गुरु से..
तंत्र-विद्या (ऑकल्ट) एक टेक्नोलॉजी है, लेकिन एक अलग स्तर की। इसको आध्यात्मिक मार्ग से हमेशा दूर रखा गया है। जब कभी आध्यात्मिक मार्ग पर चल रहे किसी साधक ने इस विद्या की ओर जरा-सा भी रुझान दिखाया, उसके खिलाफ सख्त कदम उठाए गए ताकि वो दोबारा ऐसा न करे।
     'ऑकल्ट’ यानी  तंत्र विद्या का एक हिस्सा है। अंग्रेजी शब्द 'ऑकल्ट’ का कोई बिलकुल स्पष्ट और निश्चित अर्थ नहीं है। दरअसल ऑकल्ट का मतलब सिर्फ एक खास काबिलियत है, लेकिन चूंकि कुछ लोगों ने इस काबिलियत का गैरजिम्मेदारी से और गलत इस्तेमाल किया, इसलिए 'ऑकल्ट’ शब्द का मतलब कुछ बुरा, कुछ नकरात्मक समझा जाने लगा।
तंत्र-विद्या को आम बोलचाल की भाषा में जादू टोना समझ सकते हैं। यह विद्या महज एक टेक्नोलॉजी है। आज आप भारत में अपना मोबाइल फोन उठा कर जब चाहें अमेरिका में किसी से बात कर सकते हैं। तंत्र-विद्या भी कुछ ऐसा ही है - अंतर बस यही है कि इसमें आप सेलफोन के बिना ही अमेरिका में किसी से बात कर सकते हैं। यह थोड़ी ज्यादा उन्नत टेक्नोलॉजी है। वक्त के साथ जब आधुनिक टेक्नोलॉजी का और विकास होगा, तब उसके साथ भी ऐसा ही होगा। अभी ही मेरे पास एक ब्लू -टूथ मेकेनिज्म है, जिसमें किसी का नाम बोलने भर से मेरा फोन उसका नंबर डायल करने लगता है। एक दिन ऐसा आएगा, जब इसकी भी जरूरत नहीं रह जाएगी। बस, शरीर में एक छोटा-सा इम्प्लांट लगाने से सारा काम हो जाएगा।
          तंत्र-विद्या भी इसी तरह एक टेक्नोलॉजी है, लेकिन एक अलग स्तर की, पर है भौतिक ही। यह सब करने के लिए आप अपने शरीर, मन और ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहे हैं। टेक्नोलॉजी चाहे जो हो, आप अपने शरीर, मन और ऊर्जा का ही इस्तेमाल करते हैं। आम तौर पर आप अपनी जरूरतों के लिए दूसरे पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन एक सेलफोन या किसी टेक्नोलॉजी के उत्पादन के लिए जिन बुनियादी पदार्थों का उपयोग होता है, वे शरीर, मन और ऊर्जा ही होते हैं।
        शुरू-शुरू में फोन तैयार करने के लिए आपको बहुत तरह के सामान की जरूरत होती थी। अब हम लगातार इस सामान की मात्रा घटाने की कोशिश कर रहे हैं। एक दिन ऐसा आएगा, जब हमें किसी भी सामान की जरूरत नहीं पड़ेगी - यही होगी तंत्र-विद्या। आधुनिक विज्ञान और तंत्र-विद्या कहीं न कहीं जाकर जरूर मिलेंगे, अगर इनको ठीक से समझा जाए, समझ में थोड़ा सा बदलाव लाया जाए।
            
       (आभार गुरु ब्लॉग सद्गुरु जग्गी वासुदेव  )

Sunday, February 1, 2015

मृत्यु के बाद का रहस्य

मौत के बाद क्या होता है? यह सवाल सदा उठाया जाता रहा है और मानव मन के लिए यह सदा से जिज्ञासा का विषय रहा है. लेकिन रोचक तथ्य यह है कि इस सवाल का साफ और सटीक जवाब आज तक नहीं दिया जा सका है. मृत्यु के बाद क्या होता है, इसका जवाब चाहे हम अभी न दे सकें, पर कुछ देर मृत रहकर फिर चेतना प्राप्त करने वालों ने इस रहस्य भरे प्रश्न का उत्तर अपने-अपने ढंग से दिया है. फ्रांस के एक डॉक्टर डेलाकौर ने इसी रोचक प्रश्न को अपने अनुसंधान का विषय बनाया. उन्होंने मौत के पहले पड़ाव से लौटने वाले रोगियों और दुर्घटनाग्रस्त व्यक्तियों की मन:स्थिति और उसकी मौत के पहले चरण की अनुभूतियों का गहरा अध्ययन, मनन और विश्लेषण किया. अपने अनुभवों को एक पुस्तक के रूप में उन्होंने प्रकाशित किया है.
1.....डेलाकौर ने जिन व्यक्तियों को अपने अनुसंधान का विषय बनाया, वे कोई अंधविासी नहीं थे, बल्कि विभिन्न वर्गों से संबंधित स्वस्थ मस्तिष्क के लोग थे. फ्रांस के अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अभिनेता डेनियल जीनत डॉक्टर डेलाकौर से इलाज करा रहे थे. आज से कोई 45 वर्ष पूर्व उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. उन्हें अस्पताल ले जाने में अधिक समय लग गया था. जब डेनियल को ऑपरेशन थियेटर में ले जाकर उनके शरीर के साथ दिल की धड़कन रिकॉर्ड करने वाली मशीन लगाई गई, तो मशीन की सुई अपनी जगह पर स्थिर रही. इसका साफ अर्थ था कि डेनियल की हृदयगति रुक चुकी थी.
इसके बाद क्या हुआ, इसका विवरण खुद डेनियल के शब्द में प्रस्तुत है- ‘मुझे ऐसा लगा कि मैंने कमरे में तैरना शुरू कर दिया है. एक डॉक्टर मुझ पर झुका, फिर उसने गहरी सांस ली और पीठ मोड़कर चला गया. इसके बाद एक सहायक डॉक्टर ने मुझे पूरी तरह चादर से ढक दिया. मैं उस समय बराबर चिल्ला रहा था, मुझे लग रहा था कि मेरी आवाज किसी तक पहुंच ही नहीं रही है. कुछ देर मैं बहुत भयभीत रहा, ले किन उसके बाद मैंने भय का अनुभव करना बंद कर दिया.
डेनियल ने आगे बताया- ‘इसके बाद मैंने देखा कि मेरी मां और पिता वहां आए. उन्हें देखकर मैं अत्यधिक खुशी से भर उठा. इसके बाद मेरी मां मुझे ऐसे बाग में ले गई जो रंगारंग फूलों से महक रहा था. वहां उस समय चारों ओर बच्चे ही बच्चे थे. वे सब खेलकूद रहे थे. तभी मेरी मां ने मुझे कहा- ‘देखो , तुम्हारा बेटा पास्कल वहां खेल रहा है और वह किस कदर मजे में है. सचमुच मैंने वहां पास्कल को दूसरे बच्चों के साथ मजे से खेलते देखा.’ यहां यह बात बता देना जरूरी है कि डेनियल के इस दिल के दौरे से कुछ वर्ष पहले उसके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी थी. इसके कुछ ही समय पहले उसका नन्हा बेटा पास्कल भी मर चुका था.
डेनियल ने मृत्यु के बाद के अपने इस हैरतअंगेज अनुभव के अंत में कहा- ‘मेरी मां फिर मेरे पास आयी और मुझे थपथपाकर कहने लगी कि डेनियल, अब तुम लौट जाओ, जिंदगी तुम्हारा इंतजार कर रही है. इसके बाद ही मैं यहां लौट आया.

2......बिल्कुल इसी समय ऑपरेशन थियेटर में डॉक्टर एक और ही अनुभव प्राप्त कर रहे थे. उन्होंने देखा कि डेनियल के दिल की धड़कन रिकॉर्ड करने के लिए मशीन की सुई एकाएक हरकत में आ गयी है और डेनियल के चेहरे पर भयानक पीड़ा और चेतना के चिन्ह लक्षित होने लगे थे. सहसा उसने अपनी आंखें खोलीं और उसे महसूस होने लगा कि वह अभी जीवित है. इस प्रकार दिल का दौरा पड़ने के बाद से दोबारा आंख खोलने के बीच उसने जो सफर तय किया, उस दौरान वह अपने मर चुके माता-पिता और नन्हे बच्चे से मिल आया.
अमेरिका के मशहूर डॉक्टर बेन रॉर्बट्स ने भी इसी विषय पर काफी जानकारी इकट्ठी की. उन्होंने कहा है कि मर रहे व्यक्तियों के करीब खड़े होने पर कई बार यह देखा गया है कि मृतप्राय व्यक्ति अंतिम सांस लेने से पहले अपने किसी मृत रिश्तेदार या बेहद करीबी से बात कर रहा है. कभी-कभी वह किसी अनजाने प्राकृतिक दृश्य का वर्णन करता भी पाया गया है. यह सब उनके बड़बड़ाने या फुसफुसाने के रूप में ले लिया जाता है.
3.....डॉ. रॉर्बट्स ने ग्रीस के किंगपाल के जीवन से संबंधित बेहद रोचक किस्सा बतलाया, जो इस प्रकार है- किंगपाल एक बीमारी के दौरान काफी देर अचेत रहे. अपनी अचेतनावस्था के बाद जब वे होश में आये, तो आंखें खोलने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी को बड़ा ही रोमांचक अनुभव सुनाया. उन्होंने बतलाया- ‘मैं अभी महसूस कर रहा था कि मैं दूर किसी किनारे पर खड़ा हूं. मैंने वहां देखा कि मेरे आगे काफी बड़ी काली सड़क है, जिसके अंत में एक प्रकाशपुंज दिखायी दे रहा है.’
यह सब किंगपाल ने अपनी अचेतावस्था के दौरान महसूस किया.

4... इसी सिलसिले में दस वर्षीय एक बच्चे हैंस का अनुभव भी उल्लेखनीय है. उसके साथ बीती घटना इस प्रकार है- हैंस एक दीवार के नीचे आकर बुरी तरह घायल हो गया था. डॉक्टर इस बच्चे को चेतना शून्य और मृत मान चुके थे. इसकी चेतना फिर अपने आप लौट आई. होश आने पर उसने अपना अनुभव सुनाया- ‘मैं उस दुनिया में दोबारा गया. मैं वहां बहुत खुशी महसूस कर रहा था. वहां खेल रहे बच्चों के साथ मैं और भी खेलना चाहता था, लेकिन उन्होंने मुझे बताया कि मेरे पास समय नहीं है कि मैं उनके साथ खेल सकूं. उन्होंने कहा कि मुझे वापस जाना होगा और मैं वापस आ गया.’
मौत की घाटी का यह छोटा-सा सफर हमेशा खुशगवार और शांतिदायक ही होता है, ऐसी बात नहीं है.

 5.....ऐसी स्थिति से गुजरने वाले कुछ व्यक्तियों को यह सफर अत्यधिक भयानक भी लगा. जैसे कुछ डरावने साये उन्हें दबोचने के लिए आगे बढ़े और उन्हें उन सायों की पकड़ से निकलने के लिए गहरा संघर्ष करना पड़ा. ऐसा कटु अनुभव प्रसिद्ध फ्रांसीसी नर्तकी बैनी चैरत का है. वह टीवी पर अपना नृत्य पेश कर रही थीं कि स्टूडियो में अचानक आग लग गई, जिसमें चैरत बुरी तरह झुलस गई.
अचेत अवस्था में उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया. कुछ मिनटों के बाद उनकी धड़कन बंद हो गयी, हालांकि उनके उपचार के लिए डॉक्टर लगे हुए थे. कुछ समय बाद उनके दिल की धड़कन अपने आप फिर शुरू हो गयी. उन्हें फिर होश आ गया. ठीक होने पर चैरत ने डॉक्टरों को बताया- ‘अचेतन अवस्था में मुझे लगा कि मेरा विवाह किसी अजनबी से हो रहा है. उस अजनबी का नाम ‘माइकल’ पुकारा गया.’
अपने डॉक्टर को इतना बताकर चैरत खामोश हो गयी, क्योंकि वह विवाहित थीं और तब तक उनके पति वहां आ गये थे. लेकिन यह घटना भविष्य में सच साबित हुई. ठीक चार वर्ष बाद 1968 में चैरत ने दूसरी शादी की. उनके पति का नाम माइकल था. पति की शक्ल- सूरत बिल्कुल उस व्यक्ति से मिलती-जुलती थी, जिसे चैरत ने आग में जलने के बाद अचेतन अवस्था में देखा था. कैसा विचित्र संयोग था वह?
‘मुझे ऐसा लगा कि मैंने कमरे में तैरना शुरू कर दिया है. एक डॉक्टर मुझ पर झुका, फिर उसने गहरी सांस ली और पीठ मोड़कर चला गया.'

Wednesday, January 7, 2015

"दिल का दौरा" एक गंभीर रोग .."Heart attack" a serious disease

पीपल के 15 पत्ते लें जो कोमल गुलाबी कोंपलें न हों, बल्कि पत्ते हरे, कोमल व भली प्रकार विकसित हों। प्रत्येक का ऊपर व नीचे का कुछ भाग कैंची से काटकर अलग कर दें।पत्ते का बीच का भाग पानी से साफ कर लें। इन्हें एक गिलास पानी में धीमी आँच पर पकने दें। जब पानी उबलकर एक तिहाई रह जाए तब ठंडा होने पर साफ कपड़े से छान लें और उसे ठंडे स्थान पर रख दें, दवा तैयार।
 
इस काढ़े की तीन खुराकें बनाकर प्रत्येक तीन घंटे बाद प्रातः लें। हार्ट अटैक के बाद कुछ समय हो जाने के पश्चात लगातार पंद्रह दिन तक इसे लेने से हृदय पुनः स्वस्थ हो जाता है और फिर दिल का दौरा पड़ने की संभावना नहीं रहती। दिल के रोगी इस नुस्खे का एक बार प्रयोग अवश्य करें।
- पीपल के पत्ते में दिल को बल और शांति देने की अद्भुत क्षमता है।
- इस पीपल के काढ़े की तीन खुराकें सवेरे 8 बजे, 11 बजे व 2 बजे ली जा सकती हैं।
खुराक लेने से पहले पेट एक दम खाली नहीं होना चाहिए, बल्कि सुपाच्य व हल्का नाश्ता करने के बाद ही लें।
- प्रयोगकाल में तली चीजें, चावल आदि न लें। मांस, मछली, अंडे, शराब, धूम्रपान का प्रयोग बंद कर दें। नमक, चिकनाई का प्रयोग बंद कर दें।
-  अनार, पपीता, आंवला, बथुआ, लहसुन, मैथी दाना, सेब का मुरब्बा, मौसंबी, रात में भिगोए काले चने, किशमिश, गुग्गुल, दही, छाछ आदि लें ।