यदि मानवता को सहज रूप में समझना हो तो मनुष्य में सिर्फ प्रेम ही है जो परमात्मा और उसकी बनाई हुई स्रष्टि को अच्छी तरह से समझ सकता है,प्रेम का दूसरा नाम किसी के प्रति सहानुभूति,दया भरी हमदर्दी,और हार्दिक आकर्षण है,इसके होने प्रमाण यह है कि जब मनुष्य किसी को दुखी देखे तो उसका ह्रदय मोम कि तरह पिघल जाय उसको प्रेम भरी सांत्वना दे,उसके प्रति सहानुभूति और हार्दिक आकर्षण हो और फिर उसके दुःख दूर करने का उपाय करके उसके दुःख दूर कर सके,
मनुष्य में ऐसा दिल हो जो दूसरो के दर्द को अपना दुःख महसूश करता हो,अगर इन्सान के अन्दर मेहरवानी,रहम,और मुहब्बत के गुण न हों तो ऐसे इन्सान और दीवार पर बनी इन्सान तस्वीर में कोई फर्क नहीं,ऐसे इन्सान का इस संसार और समाज में कोई महत्व नहीं |
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