Sunday, May 20, 2012

भ्रम का अँधेरा "नाग नहीं रस्सी का टुकड़ा"


  एक गांव में राम नाम का एक मेधावी छात्र था और हमेशा कक्षा में प्रथम आता था,उसकी दूसरी पाली में क्लास लगती थी,इसलिए घर पहुचने में कुछ हल्का-हल्का अँधेरा हो जाता था,एक दिन कक्षा में सर्प के विषय पर काफी चर्चा हुई,उस दिन वह सर्प के बारे में ही सोचता रहा और मन में बार-बार सर्प का ही विचार कौंध रहा था,यही सोचते-सोचते वह खेतों  के बीच के रास्ते पर जा रहा था,चलते-चलते सहसा चौंक पड़ा,सामने रास्ते पर एक सांप लेटा था,और उसका पांव सर्प  पर पड़ते-पड़ते बचा,उसकी जान गले में आगयी,सोचने लगा आज किस्मत अच्छी थी जो बच गया,धीरे-धीरे साँस रोककर पीछे हट गया,यह नाग वैसा ही था जैसा कि गांव में सपेरे की टोकरी में देखा था,अब राम ने घर जाने के लिए दूसरा रास्ता पकड़ा,सहसा राम की नज़र एक आदमी पर पड़ी जो उसी सांप वाले रस्ते पर जा रहा था,राम जोर से चिल्लाया उस रस्ते पर मत जाओ वहां सांप है,वह आदमी हाथ में टार्च लिए था,कहने लगा डरो मत मैने तुम्हारे सांप को देख लिया है,वह नाग नहीं रस्सी का टुकड़ा मात्र है,वह राम को उस जगह ले गया,राम ने टार्च की रोशनी में देखा तो सचमुच रस्सी का टुकड़ा ही था,कोई सांप नहीं था,अब दोनों खिलखिलाकर हंस रहे थे...
   कभी-कभी हम एक वस्तु को किसी दूसरे ही रूप में समझ बैठते हैं,इस कारण हम भ्रमित या भयभीत हो जाते हैं,अद्धात्मिक मत के अनुसार जिस प्रकार रस्सी में सर्प का भय दिखाई दिया उसी के समान हमारे सुख-दुःख,हमारी समस्यायें,आशंकाएँ और चिंताएं एक तरह के भ्रम पर ही आधारित होती हैं,हम पूर्ण आनन्दमयी हैं,तथापि हम श्मसान की और अग्रसारित हो रहे हैं,एक लाचार और दुर्बल प्राणी के रूप में।
 हम लोग ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे की कठपुतली जो दूसरे के इशारे पर नाचती है,इसीको अध्यातम में माया कहते हैं,इसीलिए संत-महात्मा हमें बार-बार अध्यातम की ओर ले जाने का प्रयत्न करते हैं।

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