Friday, June 1, 2012

सुख-दुःख सब हमें स्वप्न जैसे लगने लगते


कभी हम खुश होते हैं कभी हम दुखी होते हैं,दरअसल हमें महामाया ने अपने में लपेट कर रक्खा है,कभी हमें होश में लाती है कभी हमें बेहोश कर देती है,हमारा अज्ञान कभी दूर हो जाता है कभी दुबारा आकर अपने घेरे में ले लेता है,जैसे काई से ढके तालाब में हम अगर पत्थर फेंकें,तो हमें कुछ देर के लिए साफ जल दिखाई देता है,थोड़ी देर बाद काई नाचते-नाचते उस जल को फिर से  अपनी गिरफ्त में ढक लेती है,
 जब तक यह देह-बुद्धि है,तब तक दुःख-सुख,ख़ुशी-गम,जन्म-मृत्यु,रोग-शोक,आदि-आदि है यह सब देह के है,आत्मा के नहीं,
 देह की मृत्यु के बाद सम्भब है अच्छे स्थान पर ले जाये,दुःख के बाद सुख,
 जैसे प्रसव बेदना के बाद सन्तान की प्राप्ति,आत्मज्ञान होने के उपरांत जन्म-मृत्यु,सुख-दुःख सब हमें स्वप्न जैसे लगने लगते है|

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