महाराष्ट्र के एक महान संत एकनाथजी जी परम सात्विक और शांत प्रकिती के थे,उनका हर क्षण भगवान की भक्ति व लोगो को उपदेश देकर उन्हें सन्मार्ग पर लाने में बीतता था,एक दिन एक भक्त ने उनसे कहा,
महाराज! मैं वर्षों से आपके सत्संग में आता हूँ,मैंने आपको कभी क्रोध करते नहीं देखा,आपको कभी अभावों या बीमारी से विचलित होते नहीं देखा,आप जैसा निष्पाप व्यक्ति सायद ही कोई दूसरा हो,लेकिन आपका सत्संग करने के बाबजूद मुझसे कोई न कोई पाप कर्म सहसा हो ही जाता है,
एकनाथजी ने यह सुना तो,
अचानक बोले ! मेरी बात छोड़ो, मुझे आज तुम्हारे चेहरे को देखकर यह आभाष हो रहा है की सात दिनों के अन्दर तुम्हारी म्रत्यु हो सकती है,
संत जी की बात सुनते ही उसे तेज झटका लगा,वह उठा और बड़ी मुश्किल से घर तक पहुंचा,मौत की चिंता ने उसके तमाम अरमानो पर पानी फेर दिया,विस्तर पर पड़ा रहने के कारण,उसका शरीर सूखने लगा,भूख प्यास सब समाप्त हो गयी,एकनाथ जी छटे दिन उसके घर पहुंचे,
उन्हें देखकर वह बिस्तर से बड़ी मुश्किल से उठा,एकनाथजी ने जब उसका हाल पूंछा,तो उसने कहा मौत की बाट जोहने में समय बीत रहा है,
संत जी ने पूंछा,इन छह दिनों में कितने पाप कर्म किये ?
उसने बताया महाराज !मौत की बजह से एक भी पापकर्म करने या विचार करने की फुर्सत ही नहीं मिली,
संत जी ने कहा समझ लो हमारा जीवन निष्पाप और शांत क्यों है,मरण रुपी शेर यदि सामने खड़ा हो तो बुरे विचार पास फटक ही नहीं सकते,
संतजी के वचन से उसका जीवन ही बदल गया.....
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