Friday, January 20, 2012

प्रार्थना ही परमात्मा को पाने का उपाय है


वास्तव में प्रार्थना या दुआ चित्त की  वृत्ति को अपने अंतर के केंद्र पर एकाग्र और स्थिर करने का नाम है,जब हमारे मन में किसी प्रकार की इच्छा जाग्रत होती है या हम किसी सांसारिक मुसीबत से परेशान  हो  जाते हैं तो हम उस परमात्मा की शक्ति को ह्रदय में स्थिर करके,परमात्मा की ओर उसकी सात्वना पाने के लिए मुख करते हैं,
  क्योंकि  हमारा ह्रदय ही परमात्मा के रहने का स्थान है,यही सच्चा तीर्थ है,परमात्मा तो सम्पूर्ण शक्तियों के भंडार है,वही हमारे सच्चे हमदर्द भी हैं,उनकी और ध्यान करने से हमारे अन्दर अपने आप शांति आ जाती है,और हम स्वम शक्तिशाली हो जाते हैं,और उस शक्ति को पाकर हमारे मन में सुंदर विचार उत्पन्न होने लगते हैं,और हमें मुसिवातों से छूटने की युक्ति मिल जाती है,
     संसार में कोशिश और पुरुषार्थ करने की शक्ति मन से आती है ,हमारा मन प्रार्थना करने से एकाग्र हो जाता है,जिससे धैर्य देने वाले विचारों की एक ऐसी धारा उत्पन्न हो जाती है जो हमें सचेत,और होशियार,बना देती है,हमारे अन्दर मुसीवतों को सहने की ताकत आ जाती है,और साहस जाग्रत हो जाता है,ये शभी "प्रार्थना" के ही परिणाम हैं |   

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