हम देखते हैं संसार में एक भौतिकवादी के पास सारे संसाधनों के होते हुए भी वह अपने ध्येय को पाने में असफल रहता है,उसको अपने ध्येय को पाने के लिए उसके सभी संसाधन उसकी मदद नही कर पाते,तो फिर निराशा ही हाथ लगती है उसको इन असफलताओं के अंधकार में कोई आशा की किरन दिखाई नहीं देती,फिर उसको संसार की कोई वस्तु अच्छी नहीं लगती,उसको अपना जीवन बोझ लगने लगता है,उसके लिए कोई असर शेष नहीं रहता और वह निरशा के बेग में बहता हुआ आत्मघात कर लेता है,नहीं तो जीवित रहते हुए भी वह एक मुर्दे के समान दिन व्यतीत करता है जिसमे कि कोई जीवन की गति नहीं...
इसके विपरीत एक वास्तविकिता को जानने वाला पुरुष सांसारिक सामिग्री प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करता है,पर मालिक को सब कारणों का कारण समझते हुए सब फलों को उस प्रभु के हवाले कर देता है,सब कुछ उसकी आज्ञा और इच्छा पर छोड़ देता है,जो कुछ परमात्मा उसके लिए करे वह अच्छा है,क्युकी परमात्मा उसके लिए जो करे वही उसके लिए अच्छा है,यदि फल उसकी इच्छा के अनुसार हो तो परमात्मा का कृतज्ञ होता है,यदि फल विपरीत हो तो प्रशन्नता पूर्वक स्वीकार कर लेता है,क्युकी वह जानता है कि जो हो रहा है वो परमात्मा की इच्छा के अनुसार ही हो रहा है,पग-पग परमात्मा की मदद का याचक ही रहता है,क्युकी वह जनता है की कई बाते है जो हमारी कोशिश और पुरुषार्थ से परे हैं इसी मदद का नाम "प्रार्थना" है

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